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ज़र्द पेड़ों को हरे ख़्वाब दिखाना चाहें / विकास शर्मा 'राज़'

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ज़र्द पेड़ों को हरे ख़्वाब दिखाना चाहें
रुत के बहरूप शिकारी तो निशाना चाहें

हम तो मज़दूर हैं सहरा के, बना ही देंगे
जितना वीरान इसे आप बनाना चाहें

दश्त आदाब तलब करता है आने वालो
वो जुनूँ करते हुए आएँ जो आना चाहें।

एक ग़ोता भी लगाने की नहीं है क़ुव्वत
और ये लोग समन्दर से ख़ज़ाना चाहें

शेरगोई में तो यूँ काम नहीं चल सकता
ख़र्च कुछ भी न करें और कमाना चाहें