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ज़हर से भरा टब है / सैयद शहरोज़ क़मर

ज़हर से भरा टब है
जीना मुश्किल अब है

मिलना नहीं कभी
देना उधार जब है

पिंजरे से फुर्र परिन्दा
आता वापस कब है

गर्मी में बारिश हो
मुहब्बत तो तब है

ज़िन्दगी फुटपाथ की
उखड़ गई सब है

कोई नहीं 'ग़ालिब' है
जब गाँव-गाँव पब है
 
04.05.1997