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ज़िन्दगी को मुझे ढोना नहीं आता यारो / कांतिमोहन ’सोज़’

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ज़िन्दगी को मुझे ढोना नहीं आता यारो ।
और पशेमान[1] भी होना नहीं आता यारो ।।

दिल तो भोला है बहल जाएगा अब भी लेकिन
अब मेरे हाथ खिलौना नहीं आता यारो ।

ये हुनर उसने सिखाया तो बहुत क्या कीजे
हँस के कुछ भी मुझे खोना नहीं आता यारो ।

कुछ भी हो सकता है तकरार नहीं हो सकती
उसको जगना मुझे सोना नहीं आता यारो ।

नाख़ुदा ने मुझे ये दाँव सिखाया ही नहीं
अपनी कश्ती को डबोना नहीं आता यारो ।

गाँव वीरान है पनघट भी पड़ा है सूना
अब यहाँ श्याम सलोना नहीं आता यारो ।

उसका मशकूर[2] हूँ जिसने मेरा ये हाल किया
कोई कुछ भी कहे रोना नहीं आता यारो ।।

2016 में मुकम्मल हुई

शब्दार्थ
  1. शर्मिन्दा
  2. एहसानमन्द