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जाड़ा ऐलै भाय / अवधेश कुमार जायसवाल

केना-केना मोॅन करै छै
सुखलेॅ पछिया आय बहै छै
कम्बल देतै ओढ़ाय।
गाछ वृक्ष डोलै अचरा सन
गैया डिकरै छै बछड़ा संग
बकरी छकरी घरैं जोरोॅ
चट्टी दिहोॅ ओढ़ाय।
ऐले जाड़ा, मारतै पाला
घरनी मांगै लाल दोशाला
गोयठा, करसी धूप देखाबोॅ
बोरसी रखोॅ जराय।
बाग-बगीचा ओस गिरै छै
कोहरा बादल रोज घिरै छै
लेलकै चांद छुपाय।
सूरज कांपै थर-थर-थर
कद्दू लटकल छै छप्पर पर
नैका आलू केॅ भरमार
फूलोॅ केॅ डारी सदा बहार
सरसों झूमै खेते-खेत
कैसें चलबै रेते-रेत
जूŸाा दहो किनाय।
अचरा ओढ़ी, अंगना बोढ़ै
बुढ़बा दादा चादर खोजै
धान केॅ भूसा झोंकी
दादी उसनै धान
भैया बान्होॅ गमछा कान।
हरसिंगार फुलाबेॅ लागलै
दुधिया चादर बिछाबेॅ लगलै
ओस गिरै छै घासे-घास
दिहोॅ किसनमा खेतबा चास।
पतिया-पुआल दिहोॅ बिछाय।
धान फटकबै सूपे-सूप
फटकै दिहोॅ बताय।
चूड़ा मूढ़ी, कूटेॅ पड़तै
लाय-लड़ुवा बांधेॅ पड़तै
तिलसकरांत आबै छै
धीया पुता अघाय।
बांधबै धागा
रंग-बिरंगा गुड्डी दिहोॅ किनाय
गे दादी देलियौ खाट बिछाय।
देहबा लिहेॅ धिपाय गे दादी
जाड़ा ऐलै भाय।