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जाड़े का सूरज / रविशंकर पाण्डेय

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जाड़े का सूरज
कोहरे से झाँक रहा
बटन मिर्जई में ज्यों कोई
बूढ़ा टाँक रहा

सहमे-सहमे
पेड़ खड़े
हर टहनी काँपे है
एक धुँध की चादर मैली
सबको ढाँपे है
लम्बे डग भरता दिन, घर का
रस्ता नाम रहा

कथरी ओढ़े
सुबह देर तक
खुद ही सोई है
पश्मीने की शाल
धूप की खोई खोई है
सवा सेर आलस जाँगर बस
एक छँटाँक रहा

सर्द हवा में
हमें निकलना
रोजी-रोटी को
लानत सौ-सौ बार मुई इस
क़िस्मत खोटी को
मज़दूरों से मौसम का यह
खूब मज़ाक रहा