भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जाना तो बहुत दूर है महताब के आगे / आलम खुर्शीद

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जाना तो बहुत दूर है महताब[1] के आगे
बढ़ते ही नहीं पाँव तिरे ख़्वाब से आगे

कुछ और हसीं मोड़ थे रूदाद-ए-सफ़र[2] में
लिक्खा न मगर कुछ भी तिरे बाब [3] से आगे

तहज़ीब की ज़ंजीर में उलझा रहा मैं भी
तू भी न बढ़ा जिस्म के आदाब[4] से आगे

मोती के ख़ज़ाने भी तह-ए-आब[5]छुपे थे
निकला न कोई ख़तरा-ए-गिर्दाब[6] से आगे

देखो तो कभी दश्त[7] भी आबाद है कैसा
निकलो तो ज़रा ख़ित्ता-ए-शादाब[8] से आगे

बिछड़ा तो नहीं कोई तुम्हारा भी सफ़र में
क्यूँ भागे चले जाते हो बेताब से आगे

दुनिया का चलन देख के लगता तो यही है
अब कुछ भी नहीं आलम-ए-असबाब[9] से आगे

शब्दार्थ
  1. चन्दमा, चाँद
  2. यात्रा का विवरण/ वृतांत
  3. किताब का अध्याय
  4. सभ्यता
  5. पानी के अंदर
  6. पानी के भंवर का ख़तरा
  7. जंगल
  8. हरा भरा इलाका
  9. जहाँ हर कार्य के लिए कुछ कारण अवश्य हो