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जाने कब होगा ये धुआँ ग़ायब? / सुल्‍तान अहमद

जाने कब होगा ये धुआँ ग़ायब,
जिसमें लगता है आस्माँ ग़ायब।

दाना लेने उड़े परिन्दे कुछ,
आके देखा तो आशियाँ ग़ायब।

हैं सलामत अभी भी दीवारें,
उनके लेकिन हैं सायबाँ ग़ायब।

कैसे जंगल बनाए शहरों में,
हो गए जिसमें कारवाँ ग़ायब।

इस क़दर शोर है यहाँ बरपा,
हो न जाए सही बयाँ ग़ायब।

डरके तन्हाइयों से सोचोगे,
लोग रहने लगे कहाँ ग़ायब।

प्यार गर प्यार है तो उभरेगा,
लाख उसके करो निशाँ ग़ायब।