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जाने कितनी बार ठगा / धीरज श्रीवास्तव

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मन के भोलेपन को तुमने
जाने कितनी बार ठगा।

जो कुछ भी था मेरा अपना
कर डाला सब तुमको अर्पण !
देख तुम्हारे छल प्रपंच को,
जी भर रोया व्यथित समर्पण !
स्वप्न दिखाकर केवल झूठे
सच्चा पावन प्यार ठगा।

मन के भोलेपन को तुमने
जाने कितनी बार ठगा।

छाती से चिपकाकर सुधियाँ
पीड़ाओं ने लोरी गायी !
सहलाया दे- देकर थपकी
पर जाने क्यों नींद न आयी !
कर्तव्यों की अनदेखी कर
मनचाहा अधिकार ठगा।

मन के भोलेपन को तुमने
जाने कितनी बार ठगा।

निष्ठुरता ने भला प्रेम के
गीत सुकोमल कब हैं गाये !
पाषाणों ने कब लहरों की
धड़कन पर हैं कान लगाये !
ठगा सिन्धु सी गहराई को
नभ जैसा विस्तार ठगा।

मन के भोलेपन को तुमने
जाने कितनी बार ठगा।