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जिन्दगी का तजुर्बा / पल्लवी मिश्रा

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एक जिन्दगी तो
बेतरतीब सी,
बेसलीके सी,
गुजर जाती है-
उम्रभर तजुर्बा करने के बाद
कहीं जाकर
जीने की कला आती है-
पीछे मुड़कर देखने पर
अहसास होता है
अपनी गलतियों का-
अपनी नासमझ सोच का
अपनी कमियों का-
किसी मोड़ पर लिया गया
एक गलत निर्णय
किस तरह दिशा बदल देता है
जीवन की-
बदल पाता काश यह निर्णय
मन में ही रह जाती है
यह कसक मन की-
बच्चे करते हैं गलतियाँ
तो हम देते हैं उन्हें अवसर
सुधार का-
परन्तु हमें कहाँ मिलता है
मौका
अतीत की दुखती रग के
उपचार का-
मोहमाया और अहंकार में लिप्त
भागते रहते हैं उम्रभर
किसी अनजान मंजिल की ओर-
जबकि मालूम है हमें कि
‘उसकी’ हाथ में है
हमारे जीवन रूपी पतंग की डोर-
फिर भी बनकर अनजान
इस सच को झुठलाते रहते हैं-
उल्टे-सीधे कदम,
उल्टी-सीधी मंजिल की ओर
बढ़ाते रहते हैं-
ठेस खाकर जब खुलती है आँख
वक्त हाथ से फिसल चुका होता है-
उम्र का अधिकांश हिस्सा
बेसबब ही निकल चुका होता है-
हाथ नहीं आता कुछ भी
सिर्फ एक मलाल होता है-
सँभल कर शुरू से जो
चल नहीं पाते,
अन्त में बेबसी से
उनका यही हाल होता है-
सीखते-सीखते
एक उम्र तो निकाल दी,
अब नए सिरे से
कैसे जीएँ हम?
सलीकेदार,
सजी-सँवरी,
खुशनुमा
और खुशहाल जिन्दगी?