भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

जिसे ढहाया नहीं जा सका / कुमार अंबुज

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जिसे तुमने सचमुच गोली मार ही दी थी
वह अब भी मुसकराता है तुम्हारे सामने दीवार पर
तुम्हारे छापेख़ाने उसी की तस्वीर छापते हैं
तुम दूसरे द्वीप में भी जाते हो तो लोग तुमसे पहले
उसके समाचार पूछते हैं तब लगता है तुम्हें
कि दरअसल तुम मरे हुए हो और वह ज़िन्दा है

बुदबुदाते हुए हो सकता है तुम ग़ाली देते हो मन में
लेकिन हाथ जोड़कर फूल चढ़ाते हो और फोटू खिंचाते हो
तुम शपथ लेते हो वह सामने हाथ उठाए दिखता है
तुम झूठ बोलते हो वह तुम्हारे आड़े आ जाता है
घोषणापत्र में तुम विवश दोहराते हो उसी की घोषणाएँ

अब तुमने ढहा दी है उसकी मूर्ति तो देखो
सब तरफ़ सारे सवाल उसी मूर्ति के बारे में हो रहे हैं
बार-बार दिखाई जा रही हैं उसी मूर्ति की तस्वीरें
उसी चौराहे पर इकट्ठा होने लगे हैं तमाम पर्यटक
जिन्हें बताया जाता है कि यहाँ, यहीं, हाँ, इसी जगह,
वह मूर्ति थी ।