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जिस को निस्बत हो तुम्हारे नाम से / महेश चंद्र 'नक्श'

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जिस को निस्बत हो तुम्हारे नाम से
क्यूँ डरे वो गर्दिश-ए-अय्याम से

फिर कोई आवाज़ आई कान में
फिर ख़नक उट्ठे फ़ज़ा में जाम से

उन निगाहों को न जाने क्या हुआ
जिन में रक़्साँ थे नए पैग़ाम से

फिर किसी की बज़्म का आया ख़याल
फिर धुआँ उट्ठा दिल-ए-ना-काम से

कौन समझे हम पे क्या गुज़री है ‘नक्श’
दिल लरज़ उठता है ज़िक्र-ए-शाम से