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जिस शाम तुम नहीं आए / हरेराम बाजपेयी 'आश'

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अनमनी-सी धूप सूरज की, ओढ़कर श्यामली चादर,
बुलाने ही गई होगी, जिस शाम तुम नहीं आए।

चकोर गुमसुम-सा निहारता रहा नभ को,
रियल सकी न चाँदनी, जिस शाम तुम नहीं आए।

किसी ने कुछ नहीं पूछा, न मैंने ही बताया था,
उदासी साथ बैठी थी, जिस शाम तुम नहीं आए।

न घर में रौशनी पायी, न अँधेरा ही दिखा मुझको,
नयन में कैद आँसू थे, जिस शाम तुम नहीं आए।

राह की धूल जब सोई, "आश" का मन लगा सोने,
साथ साँसों ने निभाया, जिस शाम तुम नहीं आए॥