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जीवंत दस्तावेज़ / अमित धर्मसिंह

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मैंने तुम्हें
बक्से में ढूंढा
शायद तुम्हारा कोई फोटो हो
नहीं मिला
घर में कभी नहीं रही
कोई एलबम।

अख़बारों में कहाँ छपे तुम
जो ढूंढता कतरने
अखबार तो घर
आया तक नहीं
आता भी क्यों
तुम पढ़े-लिखे ही कहाँ थे।

स्कूल, मंदिर
धर्मशालाओं के शिलालेखों में
नहीं मिला तुम्हारा नाम
मिलता भी कैसे
तुमने थोड़े ही बनवाया था इन्हें।
ईंट-गारा पकड़ाने वालों की
कहानी कहाँ लिखी जाती है
शिलालेखों में

हड़प्पा, सिंधु, मोहनजोदड़ो
हर सभ्यता, घाटी में मौजूद थे तुम
लेकिन किसी की खुदाई में नहीं मिले
तुम्हारे अवशेष।

तुम्हारे किस्से
ताम्रपत्रों, सिक्कों, मोहरों
या किसी प्रशस्ति पत्र पर
गुदे नहीं मिले।

धर्म की
साहित्य की
इतिहास की
किसी किताब में नहीं
तुम्हारा उल्लेख
न कम न ज्यादा।

स्कूल से लेकर
खत्ते-खतौनियों तक के
रजिस्टर में
नहीं चढ़ाया गया
तुम्हारा नाम।

फिर भी
मैं जानता हूँ
तुम थे
आज भी हो
मेरी शक्ल में
मैं तुम्हारे होने का सुबूत हूँ
लाख मिटाए जाने के बाद
जीवंत दस्तावेज़ हूँ
तुम्हारे होने का।