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जीवन-कामनाक डोरि / ललितेश मिश्र

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के कहलक सुरूज मरैछ नहि !
अपन शाश्वत संघर्षमे
शक्ति संचय लेल
पुनर्जीवित भ’ घनघोर युद्ध
ठनबाक लेल
प्रत्येक दिन सुरूज
अन्हारकें सत्ता-साम्राज्य
सौपैत अपन अवसान
स्वीकार करैछ;
मुदा, हमरा लोकनि की करैत छी ?
कतए जाइत छी ?
प्रत्येक दोसर दिन
अपन अभियानमे नव ऊर्जाक संग
फेर ठाढ़ भेल सूर्यकें देखि
हमरा कहियो, कदाचितो
अपन नपुंसकताक बोध नहि होइछ !
हम जीबाक मात्र कामना करैत छी
यथास्थितिवादी भ’
संघर्ष हमर ईष्ट नहि, ध्येय नहि
सभ दिन, सभ क्षण, नीक-अधलाहमे
बरखा-बसातमे
हम मरिता नहि मरैत छी
कारण मरबाक कोनो टा कामना
नहि होइछ हमर मोन-प्राणमे
मोन-प्राणमे टांगल रहैछ सदिखन
जीवन-कामनका डोरि
लाल-पीयर सूत-ताग
हमरा नहि चाहि शक्ति, नहि चाही पुनर्जीवन,
पसरल रहए दिऔक
मोन-प्राणमे
अपन लहास उघबाक कामना।
जरथु मरथु बरू
दैदीप्यमान भास्कर !