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जीवन / अलेक्सान्दर पूश्किन / हरिवंश राय बच्चन

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मुझको यह मालूम नहीं है क्यों यह जीवन का वरदान
मुझे अचानक दिया गया है, जो इसके गुण से अनजान ।
मुझको यह मालूम नहीं है क्यों करके इसका निर्माण,
अन्ध नियति ने मृत्यु-लक्ष्य की ओर किया इसको गतिमान ।

किस निर्दय, किस मनमानी ने सूनेपन का पर्दा फाड़
आदिहीन तन्द्रा-निद्रा से मुझको सहसा लिया पुकार ।
किसने मेरे मन के अन्दर भर दी भावों की ज्वाला,
किसने ले मस्तिष्क उसे शत शंकाओं से मथ डाला ।

नहीं दिखाई देता मुझको नयनों के आगे कुछ ध्येय,
मन को प्रेय नहीं मिलता है, बुद्धि नहीं पाती है श्रेय,
गर्जन करता है जीवन का मेरे पीछे नित्य अभाव,
बने हुए हैं मेरे मन के ऊपर उसके शत-शत घाव ।

अँग्रेज़ी से अनुवाद : हरिवंश राय बच्चन