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जुगनू -मन / कविता भट्ट

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जुगनू -मन
जीवन-सुरंग में
घोर अँधेरा
मजदूर-से गुम
बचपन को
स्वप्नों की लड़ियों में
खोजे रातों को
किन्तु फिर टूटना
समेटना भी ,
बिखरते रहना,
सबसे बुरा-
कभी न जुड़ पाना
बचपन से,
उससे भी बुरा है
मन-जुगनू
निर्विकल्प-सी यात्रा
उदासी-भरी
असंभव तो नहीं:
किन्तु दुर्गम
अविराम चलना
अकेले भी तो;
किन्तु चलना ही है
तो एकला ही चलो