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जुड़ा-जुड़ा-सा है / गौरव गिरिजा शुक्ला

आग बुझ गई है मगर कुछ धुआँ-धुआँ सा है,
होकर जुदा मुझसे तू कुछ जुड़ा-जुड़ा सा है।

मुस्कराहट ओढ़ कर ग़म छुपाने की लाख कोशिश करो,
आँखें बता रही हैं तू कुछ बुझा-बुझा सा है।

अपने लबों से तुमने कोई शिकायत न की मगर,
तेरे अंदाज़ ने कह दिया तू कुछ ख़फ़ा-ख़फ़ा सा है।

तू चला गया मगर तेरा ख़याल है कि जाता नहीं,
नफ़रत है या मोहब्बत कुछ बचा-कुचा सा है।

इस क़दर रोये हैं कि अब आंसू ही सूख गए,
पलकों में अब मौसम कुछ सूखा-सूखा सा है।

चाहता तो हूँ कि कोई मुस्कुराता तराना लिख दूँ,
मगर मेरा वजूद ही अश्क में कुछ डूबा डूबा सा है।