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जेहो दिन रुकमिनी जनम तोहार हे / अंगिका लोकगीत

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

रुक्मिणी के दुलहे के रूप में कृष्ण आये हैं। रुक्मिणी की माँ कहती है- ‘अगर मैं जानती कि कृष्ण जामाता के रूप में आयेंगे, तो पहले से ही दान-दहेज के लिए उपयुक्त सामग्री एकत्र करके रखती।’ इस गीत में विवाह के अवसर पर धोती, अंगूठी, ताँबे के कलश आदि के अतिरिक्त गाय, भैंस आदि मवेशियों को भी दान के रूप में देने की प्रथा का उल्लेख हुआ है।

जेहो दिन रुकमिनी जनम तोहार हे।
आगे, ऐंगना झलकि गेइलो, किरिसन[1] जमाय हे॥1॥
जो हमें जानतौं गे माइ, किरिसन होइतो जमाय हे।
आगे, तसर[2] के धोतिया, राखतौं बेसाय[3] हे।
आगे, सोने के अँगुठिया गे मैयाँ, राखतों गढ़ाय हे॥2॥
जो हमें जानतौं गे मैया, किरिसन होइतो जमाय हे।
कलसी तमडुआ[4] गे मैया, राखतौं बेसाय हे।
गैया महेसिया[5] गे मैया, राखतौं बेसाय हे॥3॥

शब्दार्थ
  1. कृष्ण
  2. एक प्रकार का रेशम
  3. खरीदकर
  4. ताँबे का कलश
  5. भैंस