जोगिनि की भोगिनि की बिकल बियोगिनि की
जग मैं न जागती जमातैं रहि जाइँगी ।
कहैं रतनाकर न सुख के रहे जो दिन
तौ ये दुख-द्वंद्व की न रातैं रहि जाइँगी ॥
प्रेम-नेम छाँड़ि ज्ञान-छेम जो बतावत सो
भीति ही नहीं तो कहा छातैं रहि जाइँगी ।
घातैं रहि जाइँगी न कान्ह की कृपा तें इती
ऊधौ कहिबै कौं बस बातैं रहि जाइँगी ॥54॥