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जोगी ढ़ुढ़ण हम गया / निमाड़ी

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

    जोगी ढ़ुढ़ण हम गया,
    कोई न देखयो रे भाई

(१) एक गूरु दुजो बालको,
    तीजो मस्त दिवानो
    छोटा सा आसण बैठणा
    जोगी आया हो नाही....
    .....जोगी ढ़ुढ़णँ.....

(२) जोगि की झोली जड़ाव की,
    हीरा माणीक भरीया
    जो मांगे उसे दई देणा
    जोगी जमीन आसमानाँ....
    .....जोगी ढ़ुढ़णँ.....

(३) आठ कमल नौ बावड़ी,
    जीन बाग लगाई
    चम्पा चमेली दवणो मोंगरो
    जीनकी परमळ वासँ....
    .....जोगी ढ़ुढ़णँ.....

(४) पान छाई जोगी रावठी,
    फुल सेज बिछाई
    चार दिशा साधु रमी रया
    अंग भभुत लगाईँ....
    .....जोगी ढ़ुढ़णँ.....