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जोग को रमावै और समाधि को जगावै इहाँ / जगन्नाथदास ’रत्नाकर’

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जोग को रमावै और समाधि को जगावै इहाँ
दुख-सुख साधनि सौं निपट निबेरी हैं ।
कहै रतनाकर न जानैं क्यों इतै धौं आइ
सांसनि की सासना की बासना बखेरी हैं ॥
हम जमराज की धरावतिं जमा न कछू
सुर-पति-संपति की चाहति न हेरी हैं ।
चेरी हैं न ऊधौ ! काहू ब्रह्म के बबा की हम
सूधौ कहे देति एक कान्ह की कमेरी हैं ॥48॥