जौहैं अभिराम स्याम चित की चमक ही मैं
और कहा ब्रह्म की जगाइ जोति जौहैंगी ।
कहै रतनाकर तिहारी बात ही सौं रुकी
साँस की न साँसति कै औरौ अवरौहैंगी ॥
आपुही भई है मृगछाला ब्रजबाला सूखि
तिनपै अपर मृगछाला कहा सौहैंगी ।
ऊधौ मुक्ति-माल बृथा मढ़त हमारे गरैं
कान्ह बिना तासौं कहौ काकौ मन मोहैंगी ॥57॥