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जो तू नहीं है तो लगता है अब कि तू क्या है / फ़सीह अकमल

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जो तू नहीं है तो लगता है अब कि तू क्या है
तमाम आलम-ए-वहशत ये चार सू क्या है

किसी की याद में आँखें छलकती रहती हैं
तो और मस्लक-ए-उश्शाक़ में वज़ू किया है

उदास कर गया ये कौन मसनद-ए-गुल को
ये शोर ओ शैन है कैसा ये हा-ओ-हू क्या है

तिरे हुज़ूर भी अपने ही मसअलों में रहे
समझ न पाए कि आँखों के रू-ब-रू क्या है

सुख़न-तराज़ हो जब वो तो ऐसा लगता है
दिलों पे नूर की बारिश है गुफ़्तुगू क्या है

हर एक आँख में आँसू हर एक लब पे फ़ुगाँ
ये एक शोर-ए-क़यामत सा कू-ब-कू क्या है