भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

जो धुन निकली हवा की सिंफनी से / गौतम राजरिशी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

जो धुन निकली हवा की सिम्फनी से
हुआ है चाँद पागल आज उसी से

उबलती चाय की ख़ुश्बू में भीगी
महकती सुबह उट्ठी केतली से

निकल आये कई माज़ी के क़िस्से
ख़तों की इक पुरानी पोटली से

अभी भी खिलखिला उठता हूँ जब-तब
न जाने कब की तेरी गुदगुदी से

सुबकती रह गयीं शहनाईयाँ, फिर
सुनी जब हूक जाती पालकी से

उदासी, बेबसी, वहशत, शिकायत
हुये हासिल तुम्हारी कंपनी से

रदीफ़ो-काफ़िये की बदिशें, उफ़ !
मैं आजिज़ आ गया हूँ शायरी से

बुनी है ये ग़ज़ल तेरे लिये ही
ज़रा सुन ले इसे संजीदगी से





(गुफ़्तगू, दिसम्बर 2014)