जो भी बात न पूरी समझा
आधी और अधूरी समझा
उतना ही भूला हूँ तुमको
जितना बहुत ज़रूरी समझा
खूब अँधेरे में बैठा तो
ख़्वाबों की बे-नूरी समझा
पुल टूटा तो किसने इसको
कैसे दी मंज़ूरी समझा
बोल न कुछ तू आसमान को
दिल से दिल की दूरी समझा
मज़दूरों से मिला तो उनको
मिली नहीं मज़दूरी समझा
रोटी से मिलकर तू उसको
भूखों की मजबूरी समझा