भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
जो मसीहा बन रहे हैं मज़हबी उन्माद पर / सत्यवान सत्य
Kavita Kosh से
जो मसीहा बन रहे हैं मजहबी उन्माद पर
वे कँगूरे सब टिके हैं खोखली बुनियाद पर
दूर रहना आप तो उस भीड़ से ख़ुद ही मियाँ
पल रहे तोते जहाँ हैं हाकिमी इमदाद पर
गर बिछे हैं जाल पाखी घौंसले के पास में
तो नज़र रखना ज़रूरी है हरिक सय्याद पर
आज फिर अहसास उनके जेहन में ज़िंदा हुए
आज फिर आँसूं बहाए हैं दिले बरबाद पर
जुल्म की भट्टी में तपकर हो गया तैयार गर
तो लगाओ चोट जोरों से उसी फौलाद पर
हो रहा है दरबदर इस दौर का इंसांन यूँ
वो लगा करने यकीं ख़ुद से अधिक औलाद पर
आप ही मेरी रुबाई आप ही मेरी ग़ज़ल
शेर कह दूँ सैंकड़ों मैं आपकी इक दाद पर