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जो शख़्स दूसरों को बड़ा दर्द मंद था / राशिद हामिदी

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जो शख़्स दूसरों को बड़ा दर्द मंद था
देखा तो मस्लहत के हिसारों में बंद था

हर इर्तिकाब-ए-जुर्म पे महसूस ये हुआ
मेरा ज़मीर मेरे लिए फ़िक्र-मंद था

जिस को बड़ा गुरूर था ऊँची उड़ान पर
इक ओर इŸिाफ़ाक़ से ज़ेर-ए-कमंद था

शहर-ए-फ़साद से वो निकलता भी किस तरह
पीछे अजल थी सामने रस्ता भी बंद था

जो दार को बुलंदी-ए-किरदार कह गया
वो शख़्स सोचता हूँ मैं कितना बुलंद था

हालात थे जो भीड़ में फिरते रहे लिए
वरना हर एक आदमी ख़ल्वत-पसंद था

‘राशिद’ की हर ग़ज़ल में थीं मानी की वुसअतें
दरिया तसव्वुरात का कूज़े में बंद था