भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए

जो सुख-रूपी जल हेतु विषय-मग जाते / हनुमानप्रसाद पोद्दार

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

(लावनी दूसरी तर्ज-ताल कहरवा)

जो सुख-रूपी जल हेतु विषय-मग जाते।
वे मृग-जल-जलधि-तरंग-सदृश जल पाते॥
जैसे मृग-तृष्णा-जलसे प्यास न मिटती।
वैसे विषयोंसे सुखकी चाह न मिटती॥
ज्यों बालूके पेरे से तेल न पावै।
ज्यों जल-मन्थनसे घृत-सीकर नहिं आवै॥
कारण, न धूलमें तेल, न जलमें घी है।
वैसे ही विषयोंमें सुख-लेश नहीं है॥
जो सुख चहिये तो हरिको हरदम भजिये।
हरिके पवित्र भावोंसे तन-मन सजिये॥