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जौ रे हथिनिया मां हउदा कसा है / बघेली

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बघेली लोकगीत   ♦   रचनाकार: अज्ञात

जो रे हथिनिया मां हउदा कसा है
चढ़ि के चले चारिउ भाई
कि हां जिउ चढ़ि के चले चारिउ भाई
चढ़ि के चलेउ चारिउ भाई
जाई के पहुंचे जमुना जी के तीरे
कि मंुज मुंज करत मुखारी कि हां जिउ
मुंज मुंज करत मुखारी
कहरा कै लड़िका धोतिया लयावै
कि धोबिया के धोती पखारै कि हां जिउ
धोबिया के धोतिया पखारै
बंभना का लड़िका चन्दन गारइ
कि दुआदशी तिलक चढ़ाबै कि हां जिउ
दुआदशी तिलक चढ़ाबइ
जाइ के पहुंचे जनक जी के द्वारे
कि जेजम फरद बिछाई कि हां जिउ
जेजम फरद बिछाई
गोड़ धोवन का कोंपर मांगई
कि सहि जमुना ढरि आई कि हां जिउ
सहि जमुना ढरि आई
बस नहि आय कोऊ जौनहरी
कि राम जी का रचे ज्योनारि कि हां ज्यू
राम जी का रचे ज्योनारि
सुधर गई हां राधा औ रूकमिन
कि राम जी का रचै ज्योनार कि हां जिउ
राम जी का रचै ज्योनार
जिरिया के भात उइ रूचि रूचि रांधिनि
कि मुंगिया के दार बघारिन कि हां जिउ
मूंगिया के दार बघारिन
बरा और मुंगोरा दधिया मथि बोरिनि
कि रिकवछिं लौंग बघारिन कि हां जिउ
रिकवछ लोग बघारिन
मइदा के रोटी रूचिन से बेलिनि
कि घिउ सुरही का सुहाई कि हां जिउ जिउ सुरही
घिउ सुरही का सुहाई
कुंदुरूऔ करेला आलू औं भांटा
परवरि के तरकारी कि हां जिउ
परवरि के तरकारी अपना तो जेवइं
भरत जी के पूछइं कि कैसी लाला ज्योनारी
कि हां जिउ कैसी लाला ज्योनारी
चारिउ भाई जेवन बैठे
कि सखिया गावइं सब गारी
कि सखिया गावइं सब गारी कि हां जिउ
हम तो आहेन तीनउ लोक के ठाकुर
हमही न चाही ऐसी गारी कि हां जिउ
हमही न चाही ऐसी गारी
जो तुम आह्या तीनउ लोक के ठाकुर
काहे आया ससुरारी कि हां जिउ
काहे आया ससुरारी
कि हां जिउ