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ज्यों डूबे जहाज का पंछी / धनंजय सिंह

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यों तेरी यादों के बादल
मन पर घिर आए
ज्यों डूबे जहाज़ का पंछी
जल पर मण्डराए ।

एक-स्मृति में
सौ-सौ छवियों का मेला
शान्त झील में जैसे कोई
फेंक गया ढेला

इन्द्रधनुष के रंग न जाने
कैसे तिर आए ।

कुहरे भरी रात में जैसे
सूर्य -किरण चमके
गूँज उठे सन्नाटे में
शहनाई थम-थम के

बार-बार मन यों देख रहा मन
सपने मन-भाए !