भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

झापे झुपेरी हे बिराजे, सीरी गोबिंद जी / अंगिका लोकगीत

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

   ♦   रचनाकार: अज्ञात

प्रस्तुत गीत में इष्ट देवताओं का आह्वान किया गया है, जिनकी कृपा से दुलहिन का सुहाग अचल रहेगा तथा वह अपने पति को अपनी ओर आकृष्ट कर सकेगी।

झापे[1] झुपेरी[2] हे बिराजे, सीरी[3] गोबिंद जी।
झापे झुपेरी हे बिराजे, सीरी राम जी॥1॥
सीथे[4] सेनुर पिन्हती लाढ़ो, सामी के रीझैती जी।
जलम अहिबात जी॥2॥
झापे झुपेरी हे बिराजे, सीरी गोबिंद जी।
घूँघट से झाँकि झाँकि, बिजुली छिटकैती जी॥3॥
नाके नथिया पिन्हती दुलहिन, सामी के रिझैती जी।
सुख के होयतन बरसात जी, जलम अहिबात जी॥4॥
झापे झुपेरी हे बिराजे, सीरी गोबिंद जी।
झापे झुपेरी हे बिराजे, सीरी राम जी॥5॥

शब्दार्थ
  1. सींक की बनी हुई ढक्कनदार छोटी पिटारी
  2. सींक की बनी हुई ढक्कनदार छोटी पिटारी
  3. श्री
  4. बालों को सँवारकर बनाई हुई रेखा; माँग