झूठ को यूँ सच बता के मुस्करा दिये
अपनी वो फितरत दिखा के मुस्करा दिये
इक अँधेरी राह पे जलता हुआ चराग
फूँक से अपनी बुझा के मुस्करा दिये
मैंने पूछा चाँद को अब क्या कहेंगे आप
उसको वो पत्थर बता के मुस्करा दिये
काँच में जड़ी मेरी तस्वीर देख कर
हाथ में पत्थर उठा के मुस्करा दिये
तुम भी ऐ-‘इरशाद’ अपनी बात तो कहो
अपनी वो गर्दन हिला के मुस्करा दिये