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टोकन / प्रशांत विप्लवी

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लम्बी कतार
कुछ लोग अकेले
कुछ झुण्ड में कसकर पकडे एक-दूसरे का हाथ
कुछ किशोर-वय प्रेमी युगल
कुछ लम्बी थकान वाली गृहस्थी से उठ आई महिलाएं
कुछ उम्र-दराज़
लेकिन ज्यादातर मेट्रो के अभ्यस्त यात्री
जिन्हें टोकन के लिए लम्बी कतार में खड़ा नहीं रहना पड़ता
जिन्हें आते-जाते कोई हिचकिचाहट नहीं
उन्हें कहीं भी नहीं जाना हैं
उनका सफ़र कहीं जाने के लिए नहीं होता
वो यूँ ही घूमते रहेंगें
इसी महानगर के इर्द-गिर्द
मेरा वजनी सूटकेश और पीठ पर लदा झोला
सिर्फ मुझे यात्री बनाता है
हर बार पूछना पड़ता है
कि कौन से प्लेटफोर्म से मेरी गाड़ी मिलेगी
मेरे सामने खड़ा एक हरियाणवी ग्रामीण-अंचल से आया वृद्ध
जिसके पजामें में दो जेबें हैं
और शर्ट की छाती पर एक जेब
लेकिन टोकन को भींचकर रखा है हाथों में
जेब इस टोकन के स्पंदन को महसूस नहीं करता शायद
जेब को ये भी नहीं पता
कि महज़ इस टोकन के बिना
उन्हें इन्हीं स्टेशनों पर घूमते हुये मरना पड़ेगा
संकोची मन अचम्भे में रहेगा
रात की अंतिम गाड़ी तक इंतज़ार करते हुए
एक क्षीण आशा लिए
कि जो सुरक्षा-कर्मी है उसकी शक्ल
खूब मिल रही है उसके गाँव के लोगों से
अपनी भाषा में उसे बतायेगा
कि भौचक्का था मैं इस भीड़ से
और कांपते हाथ से छिटककर गिर गया था उसका टोकन
भय और लज्जा का मिश्रित भाव लिए
वो इन भागते भीड़ को रोककर
नहीं ढूंढ पायेगा एक छोटा-सा टोकन
कल्पना से सिहर उठा मैं
उस वृद्ध की जगह महसूस कर रहा हूँ खुद को
टटोलकर देख रहा हूँ अपना टोकन
चिल्लर ने अपने बीच दबा रखा है शायद
नहीं... ये सारे चिल्लर ही हैं
मैं सामान पटककर टटोल रहा हूँ...अपनी जेबें
थरथर काँप उठा मैं
हरियाणवी वृद्ध ने पूछा , “क्या ढूंढ रहे तुम”
टोकन... ?
फक्क सफेद पड़ गया होगा मेरा चेहरा
मुस्कुराते हुए बढ़ा दिया “टोकन”
हिफाजत से रखा करो ये टोकन
यहाँ दाखिल होने से आज़ाद होने तक का
ये एक टोकन ही संबल है
नियम-कानून और न्याय-संगत बातें
तेज हो गई उस डब्बे में
मेरे इर्द-गिर्द जैसे लाखों आँखें गड़ गई हो
और मैं धंसता जा रहा हूँ...
नीचे और नीचे... .
उद्घोषणा के साथ धक्का-मुक्की में
मैं यंत्रवत निकल आया
चलित सीढ़िया मुझे खींचकर ले आई ऊपर और उपर
मशीन के गर्त में टोकन ने जाते ही
मुझे मुक्त कर दिया...
एक संघर्षमय यात्रा से