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ठंड लग रही है मुझे / ओसिप मंदेलश्ताम

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ठंड लग

रही है मुझे


वसन्त पारदर्शी है

पित्रोपोल पहन रहा है

रोंएदार हरे वस्त्र

छत्रिक-माछ-सी फिसल रही हैं

निवा नदी की लहरें


धीरे-धीरे

घेर रही हैं मेरे मन को


नदी के उस तट पर

प्रकाश छलकाती दौड़ रही हैं मोटरें

जैसे उड़ रहे हों

लौह-गुबरैले और पतंगे


आकाश में

स्वर्ण-बकसुए से

झिलमिला रहे हैं सितारे


पर कैसे भी वे

ख़त्म नहीं कर पाएंगे

मरकत से भारी

इस मरकती समुद्री जल को


पित्रोपोल=लेनिनग्राद, पितेरर्बुर्ग या पीटर्सबर्ग नगर का एक साहित्यिक नाम ।


(रचनाकाल : 1916)