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ठनाठनी / हरगोविन्द सिंह

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बस्ती सें दूर अलग जनवासौ अनवासो
वारइ सें जान परै जैसें कुछ तनातनी,
गोलन की भड़ाभट्ट, चकरी की चक्क-मक्क
हाँतिन की टनाटन्न, घोड़न की हिनीनिनी।
रब्बी-रमतला सँग ढोलन की धमाधम्म
झाँझन की झमाझम्म फरकावै कनी-कनी,
मंगल समाज यौ, कि पल्टन कौ साज-बाज?
लरका कौ ब्याव है कि समधी सें ठनाठनी?