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ठाढ़ी रहो, डगो न भगो / ठाकुर

ठाढ़ी रहो, डगो न भगो, अब देखो जो है कछु खेलत ख्यालहिं ।

गावन दै री, बजावन दै सखी, आवन दै इतैं नंद के लालहिं ॥

’ठाकुर’ हौं रँगिहौं रँग सों अंग, ओड़ि हौं बीर ! अबीर गुलालहिं ।

धूंधर में, धधकी में, धमार में, धसिहौं अरु धरि लैहौं गोपालहिं ॥