भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

ढोते-ढोते उजले चेहरे, हमने काटी बहुत उमर / ललित मोहन त्रिवेदी

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

ढोते-ढोते उजले चेहरे, हमने काटी बहुत उमर !
अब तो एक गुनाह करेंगे, पछता लेंगे जीवन भर !!

वो रेशम से पश्मों वाला, था तो सचमुच जादूगर !
मोर पंख से काट ले गया, वो मेरे लोहे के पर !!

उसको अगर देखना हो तो, आंखों से कुछ दूर रखो !
कुछ भी नहीं दिखाई देगा, आंखों में पड़ गया अगर !!

प्यास तुम्हारी तो पोखर के, पानी से ही बुझ जाती !
किसने कहा तुम्हें चलने को, ये पनघट की कठिन डगर !!

ज्ञान कमाया जो रट-रट कर, पुण्य कमाए जो डरकर !
उसकी एक हँसी के आगे, वे सबके सब न्यौछावर !!

सिर्फ़ बहाने खोज रहा है, पर्वत से टकराने के !
बादल भरा हुआ बैठा है, हो जाने को झर झर झर !!

और भटकने दो मरुथल में, और चटखने दो तालू !
गहरी तृप्ति तभी तो होगी, गहरी होगी प्यास अगर !!