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तन्हाई के लम्हात का एहसास हुआ है / 'नसीम' शाहजहांपुरी

तन्हाई के लम्हात का एहसास हुआ है
जब तारों भरी रात का एहसास हुआ है

कुछ ख़ुद भी हूँ मैं इश्‍क में अफ़सुर्दा ओ ग़मग़ीं
कुछ तल्खी-ए-हालात का एहसास हुआ है

क्या देखिये उन तीरा-नसीबों का हो अंजाम
दिन में भी जिन्हें रात का एहसास हुआ है

वो जुल्म भी अब जुल्म की हद तक नहीं करते
आख़िर उन्हें किस बात का एहसास हुआ है

बाज़ी-गह-ए-आलम में तो इक खेल है जीना
इस खेल में कब मात का एहसास हुआ है

रूख़ पर तेरे बिखरी हुई ज़ुल्फों का ये आलम
दिन का तो कभी रात का एहसास हुआ है

कुछ ख़ुद भी वो नादिम हैं ‘नसीम’ अपनी जफ़ा पर
कुछ मेरी शिकायत का एहसास हुआ है