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तबहूँ चलत बिया सरकार / जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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जोगियन से मठ भइल उजार
तबहूँ चलत बिया सरकार॥
 
अझुरा के सझुरा न पावे
लम्मा बइठल मुँह बिचुकावे
भारी काम देखि अस कंउचे
जइसे होखे बहुत बेमार॥ तबहूँ चलत...

लिख लोढ़ा पढ़ पाथर बाटे
झुट्ठे रोज बकैती छांटे
सरके गाड़ी राम भरोसे
बनल बेवस्था डग्गामार॥ तबहूँ चलत...

खदकत खदकत भीतर-भीतर
मिलल बटेर न आधा तीतर
परथन के आगम ना घर में
तवना पर छूछिया ललकार॥ तबहूँ चलत...

भरकम देह, टुटल असवारी
अक्किल के ना खुलल केवाड़ी
बिल बिल दूर-दूर घरे दुआरे
अब केकरा उनुका दरकार॥ तबहूँ चलत...

बजल बा डुग्गी गाँवे–गाँव
धरती पर आइल अब पाँव
बरसाती कs बेंग देखाइल
सगरों एहनिन के भरमार॥ तबहूँ चलत...

छू मंतर जय हो माँ काली
के के देखल मुँह पर लाली
लेवरन नीयन चुन्ना पोत
रोज लगी जनता दरबार॥ तबहूँ चलत...