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तब कहीं जाकर एक बुद्ध ने अवतार लिया सखी / राकेश पाठक

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हमनें बुद्ध को ध्यानमग्न देखा था
हमनें बुद्ध को तपते देखा था
हमने बुद्ध को मुस्कुराते देखा था
हमने सुना था मृगदाव के प्रवचन के अंश
इस अंश से पूर्व वे बुद्ध नही हुए थे
इस प्रवचन से पूर्व आत्मबोध भी नही था उन्हें
उस पूर्णिमा की रात को पकायी गयी खीर में
सुजाता ने पकाया था बुद्धत्व
सुजाता ने उबाला था ज्ञान का ताप
अध्यअर्पण था वह खीर उस मन्नत की पूर्ती में वृक्ष देवता को
वे देवता शशरीर उपस्थित थे पाने को अमृतत्व सुजाता की पकायी हुई खीर से.

उसी रात आत्मबोध से भर गए थे बुद्ध
उसी रात दिख गया था मध्यम मार्ग उन्हें
उसी रात उन्होंने पा लिया था दुःख निवारण का मंत्र
वहीं प्राप्त अहिंसा ज्ञान के झूले चवर पर
पा लिया था अंगुलिमाल से मुक्ति के राह

सिद्धार्थ से बुद्ध बनने की प्रक्रिया में
एक भागीदारी सुजाता ने भी निभायी थी
यशोधरा ने भी त्यागा था खुद को
और कपिलवस्तु ने भी छोड़ा था बुद्ध को हठ के साथ
आलार कलाम ने भी मिट्टी को चुम कर कहा था प्यार करना.
उद्दीपक ने भी योग के सूत्रों को विपश्य करवाया था सिद्धार्थ को
और अंत मे अन्तः सलिला निरंजना ने खुले हाथ स्वीकार कर लिया था उस सिद्दार्थ को गया में
इसी प्रकृति ने बुद्ध जना था व्यष्टि के विश्रांत के लिए
तब कहीं जाकर एक बुद्ध ने अवतार लिया सखी !