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तमाम शह्र से नज़रें चुराए फिरता है / 'आशुफ़्ता' चंगेज़ी

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तमाम शह्र से नज़रें चुराए फिरता है
वो अपने शानों पे इक घर उठाए फिरता है

हज़ार बार ये सोचा कि लौट जाएँगे
न जाने क्यों हमें दरिया बहाए फिरता है

हुदूद से जो तजावुज़ की बात करता था
वो अपने सीने में पौदे लगाए फिरता है

थे आज तक इसी धोके में सबसे वक़िफ़ हैं
जिसे भी देखो कोई शै छिपाए फिरता है

अब एतमाद कहाँ तक बहाल रक्खेंगे
कोई तो है जो हमें यूँ नचाए फिरता है