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तस्वीर-ए-ज़िंदगी में रंग भर गए / महेश चंद्र 'नक्श'

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तस्वीर-ए-ज़िंदगी में रंग भर गए
वो हासदे जो दिल पे हमारे गुज़र गए

दुनिया से हट के इक नई दुनिया बना सकें
कुछ अहल-ए-आरज़ू इसी हसरत में मर गए

निकला जो क़ाफ़िले से नई जुस्तुजू लिए
कुछ दूर साथ साथ मेरे राह-बर गए

नैरंगियाँ चमन की पशेमान हो गईं
रूख़ पर किसी के आज जो गेसू बिखर गए

फूटी जो उस जबीं से इनायत की इक किरन
मग़मूम आरज़ुओं के चेहरे निखर गए

हर शय से बे-नियाज़ रहे जिन में हुस्न ओ इश्क़
ऐ ज़िंदगी बता के वो लम्हे किधर गए

ऐ ‘नक्श’ कर रहा था जिन्हें ग़र्क़ ना-ख़ुदा
तूफ़ाँ के जोर से वो सफ़ीने उभर गए