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ताछुम् ताछुम् / गढ़वाली लोक-गाथा

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   ♦   रचनाकार: अज्ञात

कोन्ती माता सूपिनो ह्वै गए, ताछुम् ताछुम्।
पांडु का सराधक[1] चैंद गैण्डो, ताछुम् ताछुम्।
ओडू आवा नेडू मेरा पाँच पंडाऊँ, ताछुम् ताछुम्।
तुम जावा पंडऊँ गैंडानाकि खोज: ताछुम् ताछुम्।
सराध क चैंद पंडौ, गैंडा की खाल, ताछुम् ताछुम्।
तब पैट्या पंडौ, गैंडा की खोज, ताछुम् ताछुम्।
नारी दुरपता तप कना बैन बोदा, ताछुम् ताछुम्।
मैं भी मेरा स्वामी, संगमांग औंदू, ताछुम् ताछुम्।
भूख लगली, मैं भोरजन ह्वै जौलो, ताछुम् ताछुम्।
प्यास लगली, मैं जली ह्वै जौलौ, ताछुम् ताछुम्।
ऊकाल[2] लगली, मैं लाठी बणी जौलो, ताछुम् ताछुम्।
पसीना होली स्वामी, रुमैल ह्वै जौलो, ताछुम् ताछुम्।
सेज की बगत मैं,नारी होई जौलो, ताछुम् ताछुम्।
जुद्ध लगलो, मैं कालिंका होई जौलो, ताछुम् ताछुम्।
त्वैकू नी होलू मेरी नारी, भूषण बस्तर, ताछुम् ताछुम्।
तू घर रली बैठी दुरपता, ताछुम् ताछुम्।
तब घूमदागैन पडऊँ, गैंडा की खोज, ताछुम् ताछुम्।
ऐ गैन पंडऊँ, हरियाली का ताल, ताछुम् ताछुम्।
वख देखी तौंन, सीतारामी गैण्डी, ताछुम् ताछुम्।
तब सीतारामी गैंडी, कना बैन बोदी, ताछुम् ताछुम्।
मैं छऊँ पंडौ, जनानी की जात, ताछुम् ताछुम्।
मैं मारी तुमारो, काम नी होण को, ताछुम् ताछुम्।
तुम जावा पंडौ, गागली का बण, ताछुम् ताछुम्।
मेरो स्वामी रंदो, वख स्वामीपाल, ताछुम् ताछुम्।
तब गैन पंडौं, गागली का बण, ताछुम् ताछुम्।
गैण्डा को ग्वैर, छयो नागार्जुन, ताछुम् ताछुम्।
मालू ग्वीरयाल मेरो, गैंडो नी खांदो, ताछुम् ताछुम्।
पीली छचरी, मेरा गैंडाक चैंदी, ताछुम् ताछुम्।
तब मारे पंडौं न, स्वामीपाल गैंडो, ताछुम् ताछुम्।
तब गाड़े पंडौन, गैंडा की खगोती[3], ताछुम् ताछुम्।

शब्दार्थ
  1. श्राद्ध
  2. चढ़ाई
  3. खाल