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तितकी / कुमार वीरेन्द्र

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बुझे तितकी ना बुझावे तितकी
का चइत का बइसाख, बस उड़े-उड़ावे, आवे इयाद जब
नज़री प सब, नचावे तितकी, कि बौराए बह रही थी पछुआ, झन-झन कर रहा था बधार, तवँ
रही थी दुपहरिया, बैठे थे हम नदी ऊपर जामुन हेठे, आधा खेत उखाड़ चुके थे खेसारी, ढरके
दिन आधा उखाड़ना था, का जाते घर, घाम तितकी, कोस-भर दूरी तितकी
सुस्ताते सूझा का तो हुमना को, पूछा, कह दिया, 'हँ, ले आ
भइयवा, तनिको तो मिटे पेट की तितकी'
औ हुमना जो कटनी को
सँगे ठहरा था

झोरने लगे तो अहा, पट-पट करते झोरा रहा था होरहा, झर रहे थे
फुटहा दाने, तड़-तड़ चबाने को, भर रहा
था मुँह में पानी

और हई, हई जवानी रे
जवानी, आपन रवानी के रँग में रँगी, तान पे तान चढ़ाने
लगी, 'अरे अँचरा तनि आपन लहरावऽ हे गोरी; घाम बाटे बिख, कटनी होवे थोरी-थोरी...', कि ई का
एगो झोंका अइसन, तितकी उड़ पकड़ ली कोन पे पतई, बुझाते जब तक, छाँव से उड़ घाम में लगी
जोम दिखाने, एक तो तपन में घास जड़े-जड़ सूखी, ऊपर से पछुआ दूत खेला
रही भूत, झूम-झोर कि हकबक बन्द, लगा जियते जान निकाल
लेगी तितकी, बनाते मुँह कह रही, हम माई-नानी
नाहीं रीत-भीत, हम तीत की
तितकी रे तितकी

लूँगी-गमछी से बुहार रहे, मार रहे थे थाप, इहाँ-उहाँ बुझे, लेकिन
काहे को, अँँखबन्द थी तितकी कनबन्द
थी तितकी

हठात् अइसन हठी, बिन
पाँव कूद रही थी बिन पाँख फरफरा रही थी, भन
भन जरा रही थी घास, बतास की जैसे सास, बढ़ने लगी यूँ, लगा थोड़ी दूर जो गेहूँ खेत, जलकर हो
जाएँगे राख, कइसन चूक तितकी हूक तितकी, करे ग़ज़बे सलूक कि खाली आपन ही नाहीं गाँव के
कई घरों के खेत, जिनमें कितनों ने महँगी मालगुज़ारी पर बोया था गेहूँ-बूँट, देख
हहर पा रहे थे न लहर, ऐसी छटपटाहट, दुनों सँगतिया सोच
न पा रहे थे उपाय, मुँहबन्द थी तितकी, डोल
रही थी, झोल रही थी जइसे
हम तो बनिहार

उसी का सब बधार, दउड़-दउड़ ऐने-ओने बुहारते-थपथपाते रहते
पर पछुआ भी कम न तितकी, बड़की
उसिकी-बिसिकी

जाने कइसन मुदई
बदले छने-छन रूप, लउके ओरे-ओर तीत-तीत तितकी
देखा, हुमना कभी लाम लेट जा रहा, चाह रहा चीख़ना, ‘ई ना, ई रे भाई’, पर दुपहरिया अइसन
अन्हार, देख रहा था जो, दिख रहा न इचिको, बस छनछनाहट, सगरो छटपटाहट, जियावत ना
मुआवत, कब तो हुमना जस ख़ुद भी लेट-लोट जाता, जर-झोंकरा जाएगाी
फ़सल, जी के का करेंगे, कवन मुँह दिखाएँगे, आड़ में ऐब
छुपाएँगे, कि तब तक इस्माइल चा जो जाने
कब तो, किनारे बंसी से मार
रहे थे मछरी

कैसे तो पड़ी नज़र, जाने किनसे चिल्लाते कहते, दौड़े-दौड़े आए
और अब तीन बुझाने लगे, पर बूझे तो
बुझे न तितकी

मतमारी वार-पे-वार
करे तितकी, करे तो करे, चाचा घिरनी जस गमछी
से बुहार-बुझा रहे थे बेपरवाह, और उन्हें भी जूझा-झँखा रही थी, इतने में आठ मछुआरे भी आ
गए, शायद चाचा उन्हें ही बुला रहे थे, गाँव से दूर इस बधार में और कोई था भी कहाँ, मछुआरों
ने आते ही अपने जाल पाँत बना बिछा दिए, आग क्या थी तितकी थी, भीगे
जाल पर गिरते बुझने लगी, दो-तीन मछुआरे जाल भीगा
भीगा गारते बुझाने लगे, और जब क़ाबू में
होने लगी, हुमना टूटे-टूट
फूट पड़ा

ताक रहा था मैं, जैसे काठ, मछुआरे हुमना को का समझा-बूझा
रहे थे, पता नहीं, मेरा कान्ह थपथपाते
इस्माइल चा तो

इहे, बस इहे कहे जा रहे थे, 'ख़ुदा का शुक्र है, बेटा कि खेत राख
होने से बच गए, नाहीं तो इनका धुआँ
जिनगी से कबहुँ

छँटता नाहीं !'