भारत की संस्कृति के लिए... भाषा की उन्नति के लिए... साहित्य के प्रसार के लिए
लोक संगीत
कविता कोश विशेष क्यों है?
कविता कोश परिवार

तीन तबके की औरतें / सरोज सिंह

Kavita Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

1. संपा

सूरज की दस्तक से बेखबर
तीन चौथाई शहर जब सोया रहता है
तब कसमसाती सी उठ जाती है संपा
आँखों को कुछ सुझाई दे
उससे पहले ही सूझ जाता है
उसे ओसारे में रखी खाली बाल्टी
एक हाथ में बाल्टी, दुसरे में मंजन ब्रश लेकर
चल पड़ती है म्यूनिस्पेलिटी के नलके की तरफ
और डट जाती है पानी के मोर्चे पर
फिर जल्दी से तैयार होकर
चाय में रोटी बोर कर खाते हुए
घरवाले को उठाती है, जो रिक्शा चलाता है
शीशे के सामने कंघी करते वक़्त
माथे पर घाव के निशान को निहारती है
जो उसे पहले पति से मिले हैं
भरती है लम्बी मांग में टक-टक लाल सिन्दूर
लगाती है बड़ी सी बिंदी...
बांग्लादेश में ही छोड़ आई अपने नेशेड़ी पति को
दूधमुही बच्ची को छाती से चिपकाए
देवर के साथ भाग आई थी
१०वी फेल बेटी अब पास ही टेलरिंग सीखने जाती है
सफिया से अब वो संपा बन गई है
रोजी-रोटी ही उसका मजहब है
उसकी बस्ती प्रवासी बांग्लादेशियों से अटी पड़ी है
वो सब कमला, विमला, निर्मला बन चुकी है,
वो बेहतर जानती हैं की घरों में काम, इसी नाम से मिलेगा
वरना घरो में मालकिनों की दया से
जो चाय भी पीने को मिलती है, वो कप उनका बिसैना हो जायेगा
वे सब इकट्ठी निकल पड़ती है, अपने काम की तरफ

2. शिल्पी

अलसुबह संपा, शिल्पी के घर का कॉलबेल बजाती है
शिल्पी दरवाज़े पर संपा को देखकर
देवी दर्शन जैसे भाव ले आती है चेहरे पर
उसे पता है जिस दिन उसके दर्शन नहीं हुए
उस दिन उसकी हालत बेगार मजदूरनी सी होती है
शिल्पी यंत्रवत दोनों बच्चों को उठाकर
स्कूल के लिए तैयार कर टिफिन बनती है
बच्चों को...बसस्टॉप तक छोड़ कर आती है
सास को चाय देती है, पति को उठाती है
उसका चाय-नाश्ता और लंच-बॉक्स तैयार करती है
पति के ऑफिस जाने के बाद
घर दोबारा आबाद होने के पहर भर पहले
जो उसका खास अपना वक़्त होता है
लम्बी सांस लेती हुई अपने और संपा के लिए चाय बनाती है
संपा तबतक झाड़ू पोछा कर चुकी होती है
दोनों तसल्ली से कालोनी की गॉसिप बतियाते हुए चाय सुड़कती हैं
4 बजे आउंगी बीबीजी.. कहकर संपा निकल जाती है फ्लैट से
इधर शिल्पी धोये कपड़ों को अपनी अधूरी हसरतों की तरह
जोर से झिड़क कर अलगनी पर टांग देती है
नहा धोकर पूजा करते वक़्त घर की बरक़त मांगती है
फिर हिसाब की डायरी निकालकर
दूध, अखबार, राशन, सब्जी, ट्यूशन, दवाई का
हिसाब लगाती हुई बची तनख्वाह गिनती है
शाम को पति से रिमोट का मसला न हो इसलिए
दिन के खाली वक़्त रिपीटेड सीरियल देख कर संतुष्ट हो जाती है
बच्चों के स्कूल से आते ही
फिर उसके बदन का मशीन चालू हो जाता है
रात बिस्तर तक पहुचने तलक
वहाँ भी पति का तंज़ उसका पीछा नहीं छोड़ता
क्या हो गया है तुम्हे?
एक दम ठंडी हो गई हो
मिसेज सहगल को देखो कितनी टिप-टॉप रहती हैं
पति की फरमाइश पूरी कर
वो करवट बदल कर यही सोचती है कि
क्या यही ज़िन्दगी है?
घर में सभी की जरूरियात पूरी करना?
क्या वो प्लास्टर औफ़ पेरिस है?
जो अलग-अलग उनके सांचे ढलती रहे?
पढाई की डीग्रीयां केवल शादी तय करने के लिए जरुरी थे?
ये कैसा मकड़जाल है जिसमे...
वो निकलने की कोशिश में और फँसती जाती है
सोचते हुए तमाम सवालों का गाव तकिया लगाकर सो जाती है

3. सूज़ी

सूरज सर चढ़ने पर, संपा पहुच जाती है
सूज़ी मैडम की कोठी पर
सूज़ी मैडम यानि सुजाता
जिसकी सोसाइटी में सुजाता नाम आउट डेटेड है
संपा की बनी ब्लैक काफी से खुलती है उसकी नींद
बच्चे दून स्कूल में पढ़ते हैं
जो सालाना छुट्टियों में ही घर आ पाते हैं
पति बिजनेस के सिलसिले में अक्सर बाहर रहता है
किट्टी, सोशल वर्क, ब्यूटी पार्लर,
शोपिंग, पार्टीज़ में खुद को मशगूल रखती है
पति के घर आते ही
खुद को हर तरह मेकप से संवारकर पेश करती है
पति को घंटो किसी से बाते करते देखकर भी अनदेखा कर देती है
उड़ती-उड़ती एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर की ख़बर को
वो सुनना ही नहीं चाहती
क्यूंकि वो सिक्युरिटी, शान और स्टेटस की
बर्खास्तगी से खौफज़दा है
वो जानती है कि पति से अल्हेदा
उसका अपना कोई वज़ूद है ही नहीं
अब उसके टखने भारी होने लगें हैं
उम्र का खौफ़ सताने लगा है
घर में संपा, माली, कुक, गार्ड इन मुलाज़िमो के इलावा
और कोई तवज्जो देने वाला नहीं है
ये सोचते हुए उसके अन्दर सांसो का साइफन लग जाता है
जो पिछली कमाई हुई खुशियां बाहर फेंकता जाता है
और उसके बदले झुरियां ब्लड-प्रेशर चिड़चिडापन की आदत
और खाली दिन और खाली रातें अता करता है l
सूजी बदहवासी में सुलगा लेती है तीसरी सिगरेट और सोचती है
कि क्या, बच्चे पैदा करना, उन्हें अच्छी तालीम देना,
योरोप का सफर करना, पति की ख्वाहिशे पूरी करना
देर रात पार्टी करना...क्या यही ज़िन्दगी है?
फिर जवाब में धीरे से बुदबुदाती है ..पेरासाईट हूँ
इतने में संपा उसके हाथों से सिगरेट छीनकर
खाना के साथ-साथ डिप्रेशन की दवा खिलाकर उससे विदा लेती है
तो यूँ सांझ के ढलते ही ख़त्म जो जाता है संपा का काम
"जा चाहीबो ता पाहिबो"
गुनगुनाते हुए...साक भाजी खरीदकर
अपने साथिनों के साथ लौट पड़ती है अपने चाळ की ओर
ऐसे में मुझे तो सबसे नीचे तबके की संपा ही
आज की आज़ाद ख्याल बिंदास और संतुष्ट औरत जान पड़ती हैl