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तीसरी बेटी का हलफनामा / सोनी पाण्डेय

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सुनिए बाबूजी
मैं धरती -आकाश
अन्न-जल
अग्नि-हवा को
हाजिर-नाजिर मानकर
यह स्वीकारती हूँ कि
मै आपके लिए हमेशा
अछूत अनगढ़ पहेली ही रही
और मै लडती रही हूँ आज तक
खुद से
ये बताने के लिए कि
मैं भी आपकी बेटी हूँ
सुनिऐ बाबूजी
मैँ हर बार आपकी चुनौतियाँ
स्वीकारती रही
और करती रही अकथ श्रम
आपने सिमेँट . बालू रख लिया
अपनी अन्य संतानोँ के लिऐ
मैँने ईँट . गारे से ही
बना डाला सीढी
और पयादान दर पायदान चढती रही
आप व्यग्य से मुस्कराकर कर निकलते रहे
आपने बनाया था अन्य के लिऐ महल
और छोड दिया मेरे लिऐ
बूढे बरगद का कोटर
मैने वहीँ उगाया रजनीगंधा
जिसकी महक आज भी घुली है
आपके महल की आत्मा मेँ
मैँ गढती रही राजा के लोहार के बेटे की तरह धारदार तलवारेँ
और आप व्यग्य से मुस्करा कर निकलते रहे
फिर भी लोहार पुत्र की तरह मैँने कभी नहीँ सोचा कि
उतार लूँ अपनी तेज धारदार तलवार से आपकी गर्दन
काश आप देखपाते उन्हेँ
जो अपनी भोथरी छूरी से काटते रहे आपकी नाक
और मैँ जंगल दर जगल भटकती रही
खोजती रही संजीवनी
जिसकी मारकता से आज भी जिँदा है आपकी नाक
आप लाते रहे सबके लिऐ
ढेर सारे खिलौने
दिखाते रहे दिवास्वप्न
कि . उनका भाग्य आपकी मुट्ठी मेँ है
और मैँ माँ की पुरानी साडियोँ को पहन दो टूक कहती रही
मेरा भाग्य मेरे कर्म मेँ है
काश !...
आप देख पाते मेरे होने का अर्थ
और सुन पाते तीसरी बेटी का दर्द।
मैँ जानती हूँ
वो रात अमावस थी
अम्मा के लिए
आपके लिए प्रलय की थी
जब मेँ आषाण मेँ
श्याम रंग मेँ रंगी
बादलोँ की ओट से
गिरी आपके आँगन मेँ।
माँ धसी थी
दस हाथ नीचे धरती मेँ
बेटी को जन कर
बरसे थे धार धार
उमड घुमड आषाण मेँ
सावन के मेघ
अम्मा की आँखोँ से
कहा था सबने
एक तो तीसरी बेटी
वो भी अंधकार सी
और मान लिया आपने
उस दिन से ही
मुझे घर का अंधियारा
मनाते रहे रात दिन
तीसरी बेटी का शोक।
देखा है मैँने आपको
उगते हुऐ पूरब से
फैलते हुऐ आकाश तक
अपराजेय योद्धा की तरह
विजयी सर्वत्र
किन्तु .
यह भी कटु सत्य है
सूरज के घर मेँ भी
होता है दक्खिन का कोना
जहाँ नहीँ पहुँती सभ्यता की रोशनी
विकास का भोर होता है केवल
दरवाजे पर
सदर फाटक पर बैठता
है आज भी पुरुष का अहं
और दक्खिन के कोन मेँ
बनायी जाती है
छोटी सी खिरकी
यहीँ से निकलती है
सभ्यता के चौपाल पर
सूरज की बेटी।
यहाँ पाप है बेटी का बिहान
यहाँ महापाप है बेटी का प्रेम
यहाँ क्षय है संस्कृति का
बेटी का होना
इस लिऐ आज भी मिलता है
दक्खिन का कोना।
सुनिऐ बाबूजी !
मेरे अन्दर जो दहकता हुआ
बहता है
गर्म लावा
वो मेरी उपेक्षा का दंश
और बेटियोँ की प्रतिभा का
दम घोँटू सन्नाटा है
जहाँ जलता है भभकर
सभ्यता का उत्कर्ष।
माँ कहती थी
बेटियाँ गंगा की बाढ हैँ
समय रहते ही बांध दो
ब्याह के बन्धन मेँ
और मैँ सोचती रही
क्या विवाह ही
औरत का जीवन है?
जहाँ नून,तेल
नाते, परते
के गुणा गणित मेँ खो बैठती
है जीवन
भुला देती है अपने सपने
और गाय की तरह खूँटे से बंधी
परम्पराओँ के नाम पर सहती है
अनमेल विवाह
अकथ पीडा
फिर भी माँ गाती थी
भिनसहरे
आँगन बुहारते हुऐ
"जाहिँ घर कन्या कुमारी नीँद कैसे आयी"
मेरे पास रास्ते नहीँ थे
चौखट के बाहर*
परम्पराओँ के पहरे थे
बेटी और बेटा मेँ
गहरा अन्तराल था
बेटे के लिऐ सदर फाटक
मंहगे स्कूल और प्रतिष्ठान थे
बेटी के लिऐ दक्खिन का कोना और दहेज का रोना था।
क्योँ बाबूजी?
क्या मैँ नहीँ करसकती थी
डाक्ट्रेट की पढाई?
क्या मैँ नहीँ बन सकती थी
प्रसाशनिक अधिकारी?
एक बार कहते मुझसे अपनी अभिलाषा
और तलाशते अपने मैँ का पैमाना
मैँ तब भी खरी थी
आज भी खरी हूँ
ध्यान से देखिए
मेरे एक एक शब्द मेँ
आपके श्रम का श्वेद
बहता है अविरल
और तीसरी बेटी करती है
रात -दिन अकथ श्रम
भरती है जतन से आपके”मैँ"
की तिजोरी।
ये तीसरी बेटी ही
आप मानेँगे एक दिन
आपकी बेटा न बेटी
वो लायक सन्तान है
जो पकडे रही नीव को
गाठेँ रही आँचल के कोर मेँ
आपके मर्यादाओँ की गठरी...