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तुम्हारी पवित्रता / असंगघोष

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मेरे पुरखे
अछूत थे
जो निम्न कहे जाने वाले
धन्धों में जीवनयापन करतेथे
साथ ही करते थे
ब्राह्मणों की सेवा-शुश्रूषा
उनके घरों,
खेतों में निपटाते
सारा कार्य
बिना मजूरी पाए।

मेरे पुरखे
अपने पेट की आग बुझाने
मरे जानवर की खाल से
तथाकथित द्विजों के पाँवों को
विबाई फटने से बचाने
बनाते थे चरणपादुकाएँ
खुद नंगे पाँव रहकर
बदले में पाते
भीख-सा अपर्याप्त अनाज।

मेरे पुरखों ने ही बनाई
मरी गाय के चमड़े से
तुम्हारे कुएँ से
पानी निकालने चड़स,
परन्तु उससे उलीचा नहीं
मेरी प्यास बुझा न सका
मैं भी अपने पुरखों की मानिन्द
अछूत था, और
कुआँ
उसका पानी
रहा फिर भी पवित्र
तुम्हारे लिए
तुम पीते रहे
मरी गाय के चमड़े से
उलीचा पानी
यह कैसी थी तुम्हारी पवित्रता
अपने स्वार्थ के लिए
कुटिल ब्राह्मण!
मुझे घिन आती है तुम पर।