तुम्हारे जाने के साथ / बाजार में स्त्री / वीरेंद्र गोयल

जैसे धरा दबाये रखती है दुख
सागर समेटे रहता है आकाश का नीलापन
तुमने भी छुपाये रखे गम
आखिर कौंधने लगा रक्त
बिजलियाँ कड़कड़ाने लगीं
घटाटोप, उमड़-घुमड़ अँधियारे में
गुम हो गयी सोच
झरते रहते थे आँसू अकेले में
अबोधता में समझ ना पाया लहरों की उठा-पटक
गिर गयी जब विद्युतरेखा
राख हो गया सब
निकल गयी हाथ से नियति की डोर
तुम्हारे जाने के साथ ही माँ
चला गया इस जीवन का स्वाद
अब कोई खुशी का मौका
रोये बगैर नहीं जाता
कितना भी मिल जाये
मन धीर कहाँ है पाता।

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