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तुम सागर हो, मैं ज्वार तुम्हें दूंगा / केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’

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मेरे गीतों को सांझ चूमने आई
मैं देख रहा तरु-शिखरों की पियराई

बोलो, बोलो, इन आंखों से छलकोगे
तुम आतप हो, जलधार तुम्हें दूंगा

मझधार और दोनों तट हाथ हिलाते
वे नखत, अग्नि-जन, धुंधले दीप जलाते

नाविक बन जाओ, आओ, आओ, आओ
तुम प्लावन हो, पतवार तुम्हें दूंगा