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तुम हमारे गीत सुनकर मत हँसो / गौरव शुक्ल

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तुम हमारे गीत सुनकर मत हँसो,
यह हमारी वेदना साकार है।

मैं जिन्हें बहुमूल्य रातें जागकर,
हूँ सजाता पृष्ठ पर ले लेखनी।
एक जिनकी पंक्ति मेरे किस तरह,
बुद्धि के खपने खपाने पर बनी।

काल के अनमोल क्षण बलिदान कर,
शब्द चुन चुनकर जिन्हें मैंने रचा।
जो रुचा मुझको, लिखा मैंने वही,
क्या करूँ तुमको नहीं यदि कुछ जँचा।

देखकर इनको न तुम चौंको अरे!
यह हमारा भीतरी संसार है।

जब कभी अनुभूतियाँ मेरी हुईं,
व्यग्र, व्याकुल फूट पड़ने के लिये।
तब हृदय के हाथ होकर के विवश,
स्वर इन्हें अभिव्यक्ति के मैंने दिये।

मैं नहीं बरबस बनाता हूँ इन्हें,
सहज, स्वाभाविक, सरल ये गीत हैं।
ये कलम की हैं न खींचातानियाँ,
यह हमारे दु: ख सुख के मीत हैं।

मोल भारी दे इन्हें हूँ पा सका,
लाभ कैसा? हानि का व्यापार है।

सोचना भ्रामक कि मैं लिखता इन्हें,
वस्तुतः यह ही मुझे लिखते रहे।
व्यक्त यह करते रहे मुझको स्वयं,
किंतु मुझसे व्यक्त से दिखते रहे।

यह समाहित हैं किये सब आप में,
नित्य मेरी ज़िन्दगी के अंश को।
यह कहीं सौभाग्य मेरा कह रहे,
या कहीं दुर्भाग्य के ही दंश को।

है कहीं इनमें करुण क्रंदन छिपा,
या भरा रसमय कहीं श्रंगार है।

है मुझे संतोष इनकी ओर से,
विष नहीं हैं, यदि नहीं हैं यह दवा।
यदि नहीं इनसे सर्जन कुछ हो सका,
दी नहीं विध्वंस को मैंने हवा।

यह भले ही शिव न हों, सुंदर न हों,
सत्य हैं मेरी मगर अनुभूतियाँ।
काव्यगत सौंदर्य से हों दूर ही,
अर्थमय हैं किंतु मेरी उक्तियाँ।

आपका सहयोग, निंदा, उपेक्षा,
मुक्त मन से सब मुझे स्वीकार है।